ये राष्ट्रीय ध्वज हमारा,
इसे सत सत प्रणाम।
अगर ना करूँ तो कुछ गद्दार कहेंगे और कुछ कायर!
पर कब से ऐसा होने लगा की हम उस ध्वजा को सर्वश्रेष्ठ आदर का चादर मानने लगे, भले ही हम में कितने दाग क्यों न लगे हों? क्या ये तब से हुआ जब उन स्वतंत्रता सेनानीयों ने अपनी बहादुरी से देश को आज़ाद कराया? तो क्या ये तब भी रहेगा जब किसी वजह से इस देश का विभाजन हो जाता है? जैसा पहले पाकिस्तान के साथ हो चूका है। पहले हमारा राष्ट्रीय पताका ही उनका था, उसी पर उन्होंने अपने जान दिए थे और परिवार की कुर्बानी, फिर एक दिन उन्हें कह दिया गया की नहीं, अब ये (दूसरा) हमारा पताका है और हम इसके लिए लड़ेंगे।
क्या वो वीर भाग खड़े हुए, जो अब तक अपनी जान किसी और झंडे पे कुर्बान किये हुए थे? नहीं। उन्होंने अपनाया की ये हमारा नया झंडा है और आदेश का पालन किया जैसा वो हमेसा करते आये हैं।
साहस और बलिदान हर किसी की रूह में आग की तरह नहीं जलती होती, कई लोगों के रूह में होती है, जो सरहद पार लड़ते भी हैं। पर ये निर्णय उनका नहीं होता की वो किस से लड़ेंगे।
किसके लिए लड़ेंगे पूछें अगर तो कह दिया जाता है की - देश क लिए, पर कौनसा देश? अपनी मिटटी? अपने गाओं की? अपने घर के? अपने प्रान्त की? तो फिर वो नक्सलवाद क्यों कहलाते हैं जो अपने पूर्वजों की मिटटी, और अपने लोगों को बचाने के लिए लड़ते हैं?
और तब उन्ही वीर सेनाओं से कह दिया जाता है की ये नक्सल तुम्हारे दुश्मन हैं, तुम्हारे देश के।
क्या होगा उस तिरंगे की कदर करके जब कभी इंसान ही इंसान की कदर ना कर पाया?
हमारे दुश्मन और देश बनाने वाले लोग अलग हैं। हमें बस यही कहा जाता है की गर्व करो, फ़क़्र करो, शहीद हो जाओ, ऐ अमर जवान।
यही वजह है की एक बेटा अपनी माँ को छोड़ के जा सकता है, एक औरत अपने सुहाग को जाने दे सकती है, एक बच्चा अपने बाप को - क्यूंकि देश के लिए कुर्बानी देना हमारा फ़र्ज़ है? पर हमारे ज़िन्दगी के साथ खेलता कोई और है।
हम में दिक्कत ये है की इसे गर्व से जोड़ा जाता है। हर काम मैं जितना गर्व होता है, इस काम मैं भी उतना ही होना चाहिए। क्या किसान हमारे लिए खेती नहीं करते अपने जान की बाज़ी लगा कर? अपना सब कुछ दाव पर लगाकर? जब इस काम को काम की तरह देखा जाने लगेगा, एक जॉब की तरह, तभी हम अपना सच अपनाने लायक हो पाएंगे। और पताका चाहे तीन रंग का हो या सात, हम मिल कर सच के साथ जी पाएंगे।
जय ज़िन्दगी।
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