कुछ कहना चाहा,
कुछ कह न पाया।
चुप रहना चाहा,
चुप रह न पाया।
पास आने की कोशिश में,
बस दुरी ही बढ़ाया।
तो झिझक कर तुमने भी पूछ ही लिया -
'अरे भई , क्या खोया, क्या पाया?'
"क्या तुमने जान पाया -
की कौन अपना, कौन पराया?
क्या तुमने पहचान पाया -
क्या है सपना, क्या यथार्थ की माया?
तो क्या हुआ अगर व्यर्थ गई हर कोशिस मेरी?
तो क्या हुआ अगर किस्मत ने दर्द की साजिश की थी?
जो होना था सो तो हो गया,
पर किसी भी गम में, तुम्हे तो भुला न पाया!
तो क्या फर्क पड़ता है -
की मैंने क्या खोया, क्या पाया?
तुमने तो ढून्ढ लिया ना अपना हमसाया।"
कुछ कह न पाया।
चुप रहना चाहा,
चुप रह न पाया।
पास आने की कोशिश में,
बस दुरी ही बढ़ाया।
तो झिझक कर तुमने भी पूछ ही लिया -
'अरे भई , क्या खोया, क्या पाया?'
"क्या तुमने जान पाया -
की कौन अपना, कौन पराया?
क्या तुमने पहचान पाया -
क्या है सपना, क्या यथार्थ की माया?
तो क्या हुआ अगर व्यर्थ गई हर कोशिस मेरी?
तो क्या हुआ अगर किस्मत ने दर्द की साजिश की थी?
जो होना था सो तो हो गया,
पर किसी भी गम में, तुम्हे तो भुला न पाया!
तो क्या फर्क पड़ता है -
की मैंने क्या खोया, क्या पाया?
तुमने तो ढून्ढ लिया ना अपना हमसाया।"
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