Skip to main content

पहला और दूसरा

१: आप लिखते हो?
२: हाँ! लिखते हैं -
१: क्या लिखते हो?
२: (ऊपर से निचे देखते हुए )
(लम्बी ताल में) - कहानियां।
१ : कहानियां !!! - और लम्बी ताल में,
अंत को लहराते हुए।
(हाव-भाव में बिना कोई परिवर्तन लाए, दूसरा पहले के सर हिलाने को देखता रहता है।)
१: तो सुनाओ
२: क्या?
१: कहानी।
२: (सोच में)
१: वैसे जब कहानी लिख नहीं पाओगे तब क्या करोगे?
२: आप जब देख नहीं पाएंगे तो क्या करेंगे?
१: मैं क्यों देख नहीं पाउँगा?
२: मैं क्यों लिख नहीं पाउँगा?
१: (उसकी बात मानते हुए, उसके तरफ सर उठा के देखते हुए) अच्छा।
२: बुरा।
१: क्या बुरा?
२: क्या अच्छा?
१: तुम्हारी बात।
२: बुरा ...
१: (becomes happy as he has won) अच्छा |
(ऊपर से निचे देखते हुए ) (अंत को लहराते हुए)
२: (हाव-भाव में बिना कोई परिवर्तन लाए, दूसरा पहले के सर हिलाने को देखता रहता है।)
१: वैसे तुम लेखक कुछ काम के होते कहाँ हो?
कभी कमा के कुछ ला भी नहीं पाते, न ही कोई काम तरीके से करने की तुम्हारी काबिलियत होती है।
२: हो सकता है। और जो काम के होते हैं उन्होंने क्या हालत बनायी है इस समाज की?
१: दिक्कत क्या है इस समाज मैं? हम खा रहे हैं, तुम जी रहे हो, हम कमा रहे हैं, तुम गवा रहे हो।
२: हम में कोई दिक्कत नहीं।  जैसा होगा, हम तो जी लेंगे - पर समाज ये तय करने लग जाता है की हम कैसे जियेंगे। अगर वो मदिरा पान करता है, उसे घर से लात मार के निकाल दो, पर जो मदिरा बेचता है, उसकी कहाँ कुछ गलती? अगर वो चोरी करता है तो उसे कैद में डाल दो, ना की ये सोचें की कैसे उसे ये साबित किया जाए की चोरी बिना किये भी जो चाहिए वो हासिल किया जा सकता है।
१: और फिर भी वो बोलेगा की मैं चोरी ही करूँगा तो?
२: फिर बोलेगा जेल से निकल के आपको मारूंगा तो?
१: मैंने क्या किया?
२: उसने भी क्या किया है? अब तक? मैं उन गुंडों की बात नहीं कर रहा जो हवस के नशे में अपने खौफ फैलाने की कोशिस करते हैं। मैं उनकी बात कर रहा हूँ जिन्हे मजबूरन चुराना पड़ता है। ऐसे लोगों के पास रास्ते क्या होते हैं? या तो उन्हें जेल का घिनौनापन देखकर वैसा ही जानवर बनना पड़ता है जो हवस के नशे में खौफ फैला सके।
१: (कुछ देर ठहर कर) तुम रह लोगे ऐसे लोगों के साथ?
२: कैसे लोग?
१ : वही ... जो कभी भी, कुछ भी कर सकते हैं।
२: क्या आप नहीं कर सकते?
१: क्या?
२: कभी भी, कुछ भी।
(उसे देखते हुए) फिर भी तो मैं आपके सामने खड़ा हूँ।
१: (hesitantly लाफिंग) मुझसे कोई डरने वाली बात थोड़ी न है!
२: क्यों? आपने कभी किसी पे हाथ नहीं उठाया? कमज़ोर समझ के नहीं पीटा? गुस्से में आवाज़ ऊँची नहीं की?
१: पर मैंने कभी किसी के साथ कुछ गलत नहीं किया।
२: कभी पुछा है आपने? अपनी पत्नी से, अपने बेहेन से, अपनी बेटी से?
१: तुम लेखक लोग (डिसगस्टिंगली) तुम्हारे लिए जो पाप है वो पाप नहीं, और जो अपने काम से मतलब रखता हो - वो पापी !
२: पापी तो सब हैं, पर सज़ा देने वाले हम कौन होते हैं?
१: बुज़ुर्ग होते हैं।  सज़ा देने वाले बबुजुर्ग होते हैं (responds assertively)
२: आपने भी ली है लगता है।
१: क्या?
२: सज़ा।
(पहला सोच में डूब जाता है। )
२: तो आज आप कहानी सुनाओ।

                                   --------- एन्ड ऑफ़ पार्ट 1  ------------

Comments

Popular posts from this blog

चुप्पी

कभी कोई भी बात हो, कोई छोटी सी जस्बात हो, या कभी किसी से मुलाक़ात हो, तो मुझसे कहना। पल दो पल का साथ हो, कोई अनकही मुराद हो, जो भी दिल में बात हो, वो मुझसे कहना। अगर, कभी कोई ऐसी बात हो, जो मुझसे ना कह पाओ, उसे अपने दिल में मत दबाओ, या बिना कहे मत भूल जाओ। बताओ! क्यूंकि मैं सुन सकता हूँ सह सकता हूँ मान सकता हूँ अपना सकता हूँ जो भी सच हो, क्यूंकि मुझमे और तुम में कोई फर्क नहीं है। जो तुम्हारा सच है , वो ही मेरा भी है। सब कुछ बर्दाश्त हो सकता है पर तुम्हारी चुप्पी नहीं। 

क्या खोया, क्या पाया?

कुछ कहना चाहा, कुछ  कह न पाया। चुप रहना चाहा, चुप  रह न पाया। पास आने की कोशिश में, बस दुरी ही बढ़ा‌या। तो झिझक कर तुमने भी पूछ ही लिया  - 'अरे भई , क्या खोया, क्या पाया?' "क्या तुमने जान पाया - की कौन अपना, कौन पराया? क्या तुमने पहचान पाया - क्या है सपना, क्या यथार्थ की माया? तो क्या हुआ अगर व्यर्थ गई हर कोशिस मेरी? तो क्या हुआ अगर किस्मत ने दर्द की साजिश की थी? जो होना था सो तो हो गया, पर किसी भी गम में, तुम्हे तो भुला न पाया! तो क्या फर्क पड़ता है - की मैंने क्या खोया, क्या पाया? तुमने तो ढून्ढ लिया ना अपना हमसाया।"

The Red Pasta

White, Or red? Red, you said. I walked along. A saree, A smile A million hurled desires The calmness of the sea, Some titillating bourbon & And a few dozen joints. We cooked our pasta, In the heat of the moment.