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एक दिन मेरे चेहरे पे झाड़ उग आए।

जी हाँ। हरे, घने, लंबे झाड़। 

लोग उसे देख घृणा से कांप उठते। 
कोई चीड़ कर कहता तो कोई उम्मीद लेकर -
"इन्हें काट आओ, ये क्या हालात बना रखी है?"

कहना तो चाहता था की ये फसल कुदरत की देन है
पर उन्हें कहाँ इससे फर्क पड़ता!
उन्हें तो बस ये घिनौनापन अपने आँखों से दूर करना था। 

हार तो नहीं मान सकता था, तो दूर ही सही। 
कहते हैं झाड़ की जगह जंगल में होती है,
तो वहीँ चला गया, झाड़ और भी बढ़ने लगे। 

अब मेरा हिलना डुलना भी मुश्किल हो गया था,
फिर भी झाड़ से पेट भरने लायक फल मिल जाते थे
- जुएं, मकड़ियां, केछुऐं इत्यादि।

सालों बीत गए थे शायद,
मैं भूल गया था -
जंगल मुझमे है या मैं जंगल में। 
सब कुछ शांत था,
फिर गोलियां और चींखों की गूँज उठी,
कान बंद करने को हाथ ना मिले,
मैंने भागने की कोशिस की,
पर हिल भी ना सका। 

गोलियों की आवाज़ बंद हो गयी,
और चींखों की भी। 
कुछ लोग अपने कंधे पर लाशें ला रहे थे 
और उसे एक जगह इकट्ठा कर रहे थे। 
न्यामगिरी समीप इन लाशों की पर्वत पर 
आग लगा दी गयी। 

वो लपट तेज़ थी,
जैसे सुलग-सुलग कर कुछ कहना चाहती हो। 
अपनी चपेट में पूरी जंगल ले गयी। 
मेरे आंसू भी इस लपट को बुझा न सकते थे। 

वर्षों से जो हरा भरा था आज जर-जर काला हो गया। 
मैं वहीँ पड़ा था -
अपने ही मूत्र-सर्जन की दलदल में विलीन। 
लपट मुझ तक तो आयी,
पर दलदल जला ना पायी। 
पहले हाथ ढूंडा, फिर पैर,
और कोशिस कर-कर उठ गया,
चलने लगा। 

कोई भार न था अब चेहरे पे,
कोई लोग न थे जो कहते थे।
बस कुछ एक-आध बचे थे,
जो अधजले टुकड़े बटोर रहे थे। 

कहीं बिच सड़क पर बैठ गया,
और जा भी कहाँ सकता था?
'क्या इनकी सोच भी मेरे झाड़ की तरह कुदरती थी -
जिसे ये काटना नहीं चाहते थे?'
मैं सोचता रहा हो मौन। 
कुछ ने पुछा तुम कौन?
और कुछ ने तो डराया,
किसी ने बगल में राम मंदिर भी बनवाया। 
पर मुझे समझ ना आया,
क्या थी ये कुदरत की माया? 

आज भी मंदिर में लोग आते हैं,
कुछ खाना दान कर जाते हैं -
और पैसे भी। 
उन पैसों से रोज़ सुबह मैं दाढ़ी कटवाता हूँ। 


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