मैं हूँ शब्दों की वैश्या।
ले! लेगा नहीं क्या मेरे शब्द?
अरे, कहाँ जा रहा है?
देख, कितने बड़े, कितने भारी हैं मेरे शब्द।
पकड़ के देख, पास आ।
चल, अंदर और सुन्दर दिखाती हूँ।
शब्दों से नहलाती हूँ।
आवाज़ पसंद है न तुझे मेरे शब्दों की -
बोल के भी सुनाती हूँ।
तू बैठ। तू खरीदेगा नहीं तो मैं खाऊँगी क्या?
जैसा बोलेगा वैसे शब्द बनाउंगी,
मैं शब्दों की वैश्या हूँ ना -
तू जितना चाहे कोस ले, मैं बस यही कर पाऊँगी।
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पहन ले कपड़े, दूसरा कस्टमर आएगा।
मन नहीं भरा क्या?
अब फिर से तू वही बन जाएगा।
तेरा असली चेहरा तो मैं देखी हूँ,
तू दुनिया को क्या दिखायेगा?
जा! फिर से आना -
अपने खोख्लेपन को मेरे शब्दों से भरने,
तू सुधर गया तो भूखा मरना पड़ेगा।
शब्दों की वैश्या हूँ ना,
कुछ और कर जो नहीं सकती।
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