दुनिया से आलसपन देखा नहीं जाता। ऐसे लोग जो इसमें लीन रहते हैं, उन्हें दुनिया लात मार मार कर कुछ करने को मजबूर करती है। "हम काम कर हैं तो तुम कैसे बैठ सकते हो !" ऐसा कह के आलसियों पर अपनी भड़ास निकाली जाती है। परन्तु एक आलसी ही देख सकता है काम करने वालों की मजबूरी को।
ना चाहते हुए भी ये आलसपन के भोगी, लोगों की नियत, पहुँच, सोच का नुमायना बड़ी आसानी से कर लेते हैं। चूँकि हर इन्सान इन्हे लात तो मारेगा ही, किन्तु वो कब मारेगा ये उसके चरित्र का उल्लेख कर देती है। इतने चेहरों की सच्चाई को देखने के पश्चात, यह वक़्त से पहले ही उन्हें प्रतीत होने लगता है की किस चेहरे के पीछे कौन छिपा है। दुनिया को ऐसे लोगों की बातें स्पष्टतः आलोचनात्मक लगती है।
एक दायरा होता है आलसियों का - की तुम किस हद तक जा सकते हो आलसी बने रहने के लिए। क्या तुम झूठ बोल सकते हो? झूट से घृणा का आविष्कार भी शायद उन्ही लोगों ने किया जो काम करने को मजबूर हैं। क्योंकि जो सही या गलत कुछ भी नहीं कर रहा हो, तुम उसे दोष भी कैसे दे सकते हो? कुछ नहीं मिला तो उन्हें यही दोष देना पड़ा की "तुमने झूठ बोल दिया! ये तो घोर पाप है" और एक फरेबी की नज़रों से उन्हें देखा जाता है। क्या आपका भी कोई दायरा है?
हर आलसी का एक दायरा होता है और हर इंसान का भी। कोई झूठ नहीं बोल सकता, कोई किसी की बात नहीं सुन सकता, कोई मोहोल्ले में सर झुका के नहीं चल सकता, तो कोई भूके पेट नहीं सो सकता। जब कोई भी मजबूर हो जाता है, वह निशित रूप से किसी और को मजबूर तो करेगा ही।
पर मजबूर किये गए काम से बेहतर यही है की कोई काम ही न हो। आज की दुनिया में ही देख लो - हानि पहुँचाने वाले चीज़ें कितने हैं और लाभ पहुंचाने वाले कितने।
तो दुनिया आलसियों और काम करने वालों में नहीं बंटी है। इसमें वो लोग हैं जो अब तक मजबूर नहीं हुए और वे जो हो गये। उन्हें लात मारना, लज्जित करना, घृणा भाव से देखना\जो तुम स्वयं ही थे, केवल इसी बात को दर्शाता है की तुम खुद से कितनी घृणा करते हो।

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