कुछ बिखरे बिखरे शब्द
कुछ ऐसे वैसे दिनों के।
कुछ खोई खोई बात,
भीने भीने लम्हों के।
गुमनाम उस शहर में ,
जब गुमसुम हम खड़े थे,
गैरों की वह दुनिया थी,
अपने दुर पड़े थे।
हाँ! चाहत यही थी,
अकेलेपन में रहने की,
पर ओझल ये निगाहें,
अपने की तलाश में डूबे थे।
"गौर करो", किसी ने कहा,
"ये शहर कैसे रो रहा है।"
"सिसकियाँ सुनो इसकी,
यहाँ हर कोई तनहा हो रहा है।"
सन्नाटा। शांति। समर्पण।
कुछ ऐसे में शांत हुआ।
शुक्रिया करना चाहा मैंने उस शक़्स का,
तो उन्होंने कहा,
"ज़रा ऊँचा बोलो भाई, मैं कबका बेहरा हो गया।
कुछ ऐसे वैसे दिनों के।
कुछ खोई खोई बात,
भीने भीने लम्हों के।
गुमनाम उस शहर में ,
जब गुमसुम हम खड़े थे,
गैरों की वह दुनिया थी,
अपने दुर पड़े थे।
हाँ! चाहत यही थी,
अकेलेपन में रहने की,
पर ओझल ये निगाहें,
अपने की तलाश में डूबे थे।
"गौर करो", किसी ने कहा,
"ये शहर कैसे रो रहा है।"
"सिसकियाँ सुनो इसकी,
यहाँ हर कोई तनहा हो रहा है।"
सन्नाटा। शांति। समर्पण।
कुछ ऐसे में शांत हुआ।
शुक्रिया करना चाहा मैंने उस शक़्स का,
तो उन्होंने कहा,
"ज़रा ऊँचा बोलो भाई, मैं कबका बेहरा हो गया।
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