मेरा गाँव, जो कभी न था, जिसकी खेतों में मैं कभी न खेला, न की कभी कुओं से सिंचाई, न कभी साथी संग दौड़ा, छत पर लिए पतंग लटाई। जहाँ भँवरे थे सदा भंवराते, जहाँ पक्षियों की गूँज सहज थी, जहाँ नदी ज़मीन को यूँ धोती, मानो कंकड़ न हो, वो हो मोती। न दौड़ा कभी उस गाडी क पीछे, जो अर्सों में एक बार आती थी, न गोता कभी दूर बाँध को, दांव लगाकर उसकी गहराई। बरगद के वो पेड़ नहीं थे, जिसकी लताओं से हम झूल सकें, न थे मुंशी के आम के बगीचे, जिनसे चुरा हमे कुछ सीख मिले। टायर जहाँ लकड़ी से चलती, जहाँ कंचों की आवाज़ कनकती, हर रात जहाँ जलती मोमबत्ती, जहाँ खाट पर लेट बाहर मैं, कभी सुलझा न पाया तारों की गुत्थी, क्यूंकि ऐसा मेरा गाँव न था और इसका मुझे अफशोस नहीं?