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Showing posts from July, 2016

झक्की

देखो उसको कैसे वह थुरराके बैठा है, खुदका खुदपे वश नहीं धूर्राके बैठा है, पुस्तकों में जो था लिखा पढ़ लिया लेकिन, खुदको पढ़ने बाद वह उम्मीद खो बैठा है। 

कवी की कविता

मैं कवी और तू मेरी कविता, तेरे संग मेरा क्या रिश्ता, तू है मधुर और मैं कटुधारा, तू है सरल, मैं उलझा जाला।  फिर क्यों तू मुझमे बार बार आती है, प्यार है तो कभी क्यों नहीं बतलाती है, संकोच क्या है गर दुनिया का भय नहीं, डर मत! इस प्यार की दुनिया को समझ नहीं। 

आलसपन

दुनिया से आलसपन देखा नहीं जाता। ऐसे लोग जो इसमें लीन रहते हैं, उन्हें दुनिया लात मार मार कर कुछ करने को मजबूर करती है। "हम काम  कर हैं तो तुम कैसे बैठ सकते हो !" ऐसा कह के आलसियों पर अपनी भड़ास निकाली जाती है। परन्तु एक आलसी ही देख सकता है काम करने वालों की मजबूरी को। ना चाहते हुए भी ये आलसपन के भोगी, लोगों की  नियत, पहुँच, सोच का नुमायना बड़ी आसानी से कर लेते हैं। चूँकि  हर इन्सान इन्हे लात तो  मारेगा ही, किन्तु वो कब मारेगा ये उसके चरित्र का उल्लेख कर देती है। इतने चेहरों की सच्चाई को देखने के पश्चात, यह वक़्त से पहले ही उन्हें प्रतीत होने लगता है की किस चेहरे के पीछे कौन छिपा है। दुनिया को ऐसे लोगों की बातें स्पष्टतः आलोचनात्मक लगती है।  एक दायरा होता है आलसियों का - की तुम किस हद तक जा सकते हो आलसी बने रहने के लिए। क्या तुम झूठ बोल सकते हो? झूट से घृणा का आविष्कार भी शायद उन्ही लोगों ने किया जो काम करने को मजबूर हैं। क्योंकि जो सही या गलत कुछ भी नहीं कर रहा...

मेरा गाँव

मेरा गाँव, जो कभी न था,               जिसकी खेतों में मैं कभी न खेला, न की कभी कुओं से सिंचाई, न कभी साथी संग दौड़ा, छत पर लिए पतंग लटाई।  जहाँ भँवरे थे सदा भंवराते, जहाँ पक्षियों की गूँज सहज थी, जहाँ नदी ज़मीन को यूँ धोती, मानो कंकड़ न हो, वो हो मोती। न दौड़ा कभी उस गाडी क पीछे, जो अर्सों में एक बार आती थी, न गोता कभी दूर बाँध को, दांव लगाकर उसकी गहराई। बरगद के वो पेड़ नहीं थे, जिसकी लताओं से हम झूल सकें, न थे मुंशी के आम के बगीचे, जिनसे चुरा हमे कुछ सीख मिले। टायर जहाँ लकड़ी से चलती, जहाँ कंचों की आवाज़ कनकती, हर रात जहाँ जलती मोमबत्ती, जहाँ खाट पर लेट बाहर मैं, कभी सुलझा न पाया तारों की गुत्थी,                        क्यूंकि ऐसा मेरा गाँव न था                                     और इसका मुझे अफशोस नहीं?

महानगर

कुछ बिखरे बिखरे शब्द कुछ ऐसे वैसे दिनों के। कुछ खोई खोई बात, भीने भीने लम्हों के। गुमनाम उस शहर में , जब गुमसुम हम खड़े थे, गैरों की  वह दुनिया थी, अपने दुर पड़े थे। हाँ! चाहत यही थी, अकेलेपन में रहने की, पर ओझल ये निगाहें, अपने की तलाश में डूबे थे। "गौर करो", किसी ने कहा, "ये शहर कैसे रो रहा है।" "सिसकियाँ सुनो इसकी, यहाँ हर कोई तनहा हो रहा है।" सन्नाटा। शांति। समर्पण। कुछ ऐसे में शांत हुआ। शुक्रिया करना चाहा मैंने उस शक़्स का, तो उन्होंने कहा, "ज़रा ऊँचा बोलो भाई, मैं कबका बेहरा हो गया।