सच लिखता हूँ - शायद वो भी लिखते हों। फ़र्क़ बस इतना है, की वो याद रखने के लिए लिखते हैं - और मैं भूलने के लिए। ये अफ़साने कोई गीत नहीं, बस आखरी नुमाइश हैं।
कुछ बिखरे बिखरे शब्द, कुछ रूखे सूखे दिनों के।
कुछ बिखरे बिखरे शब्द, कुछ रूखे सूखे दिनों के।