बैरी हवाओं में तुम काली घटाओं में तुम उलझी लटाओं में तुम बहती फ़िज़ाओं में तुम तुम से जुदा नहीं हम हम से खफा नहीं ग़म गम को बना सर-ग़म छेड़ेंगी उसकी ताल - हम तुम। थोड़े भीगे भीगे थे तुम, थोड़े भीगे भीगे थे हम, कुछ भीगा मौसम और तुम मेरे पास थे। आंखें थी नम, भीनी-भीनी बातें थी कम आधी-आधी सोया जहाँ था पर तुम मेरे साथ थे।
कुछ बिखरे बिखरे शब्द, कुछ रूखे सूखे दिनों के।