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Showing posts from September, 2017

हम तुम

बैरी हवाओं में तुम काली घटाओं में तुम उलझी लटाओं में तुम बहती फ़िज़ाओं में तुम तुम से जुदा नहीं हम हम से खफा नहीं ग़म गम को बना सर-ग़म छेड़ेंगी उसकी ताल - हम तुम। थोड़े भीगे भीगे थे तुम, थोड़े भीगे भीगे थे हम, कुछ भीगा मौसम और तुम मेरे पास थे। आंखें थी नम, भीनी-भीनी बातें थी कम आधी-आधी सोया जहाँ था पर तुम मेरे साथ थे।