तू जा ! तुझे क्या? - जो इस तरह तूने किया ये फैसला। जो फासला है बन रहा वो तो सिर्फ तुम्हारी चाहत की पूर्ति है। चाहत थी कभी तुम में भी। हो सकता है वो मेरे लिए ना भी हो, लेकिन मेरे होने से मौजूद रहती थी और मेरे ना होने से नहीं। दूर हो कर हमने सिर्फ इतना जान पाया की ये रिश्ता तुम्हारी चाहतों का मोहताज है। तुम चाहोगे तो हम हैं तुम ना चाहो तो नहीं। कुछ बुरा नहीं है ये। जी लूंगा ख़ुशी से इस uncertainity के साथ तब भी, तू जा कोई फ़िक्र किये बिना क्यूंकि तू रुकना नहीं चाहती। मेरा बदल जाना काफी नहीं होता, तुम्हे मुझे चाहने के लिए। लेकिन तुम्हारा चाहना काफी होता, मेरे बदल जाने के लिए।
कुछ बिखरे बिखरे शब्द, कुछ रूखे सूखे दिनों के।